बलात्कारियों ने सारी की सारी मानवता को तार-तार कर दिया

वैज्ञानिक तौर पर फांसी दुष्कर्म को रोकने का कारगर उपाय नहीं हो सकता? भारत में रेपकांड पर फांसी मुकर्रर है, बावजूद इसके बलात्कारियों में कोई भय नहीं? निर्भया के दोषियों को जब सूली पर चढ़ाया गया, तो उस वक्त लगा कि अब ऐसे कृत्य करने वालों में डर पैदा होगा।
बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए इसे प्रयोग कहें, या समय की जरूरत? जरूरत तो वैसे कई वर्षों से महसूस हो रही है। बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की रफ्तार को थामने के लिए पाकिस्तान की हुकूमत ने भारत जैसे देशों को आईना दिखाया है। पाकिस्तान में रेपिस्टों को रासायनिक तरीके से नपंसुक बनाने का एलान हुआ है। दुष्कर्म को सबसे बड़े अपराधों में गिना जाता है, इसमें सजा देने के नियमों में बदलाव के साथ समय≤ पर नए सिरे से परिभाषित भी किया गया, बावजूद इसके दुष्कर्म की घटनाएँ घटने के जगह बढ़ीं। इस कृत्य से कोई एक देश नहीं, बल्कि समूचा संसार दुखी है। पड़ोसी देश पाकिस्तान भी परेशान है, बीते कुछ सालों में वहां अप्रत्याशित रूप से बलात्कार की घटनाएँ घटीं। अभी कुछ दिन पहले वहां एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे पाकिस्तान को झकझोर दिया। पंजाब के सिंध प्रांत में मां-बेटी के साथ कई लोगों ने सामूहिक बलात्कार की जघन्य वारदात को अंजाम दिया। घटना कमोबेश दिल्ली में घटित निर्भया कांड जैसी ही थी। बलात्कार करने के बाद बदमाशों ने दोनों मां-बेटी के साथ जानवरों से व्यवहार किया। घटना से दुखी होकर अगले ही दिन प्रधानमंत्री इमरान खान ने बलात्कार पर पहले से बने कघनूनों को बदल कर कठोरतम कानून बनाने का फरमान जारी कर दिया। बलात्कारियों को सजा के रूप में नपुंसक बनाने का कानून पारित हुआ। इमरान खान के इस कदम की पाकिस्तानियों ने खूब प्रशंसा की।
कुछ ऐसे ही कानून बनाने की मांग हिंदुस्तान में भी उठती है। लेकिन, उस पर अमल नहीं हो पाता। जबकि, भारत में बलात्कार के केस सबसे ज्यादा प्रतिदिन दर्ज किए जाते हैं। सवाल उठता है, जब बलात्कारियों को पाकिस्तान जैसे छोटे मुल्क में नपुंसक बनाया जा सकता है तो भारत में क्यों नहीं? तुलनात्मक रूप से पाकिस्तान से हमारा कोई मुकाबला नहीं, लेकिन उनके इस निर्णय से हम कुछ सीख ले सकते हैं।
वैज्ञानिक तौर पर फांसी दुष्कर्म को रोकने का कारगर उपाय नहीं हो सकता? भारत में रेपकांड पर फांसी मुकर्रर है, बावजूद इसके बलात्कारियों में कोई भय नहीं? निर्भया के दोषियों को जब सूली पर चढ़ाया गया, तो उस वक्त लगा कि अब ऐसे कृत्य करने वालों में डर पैदा होगा। लेकिन हुआ उसके उलट, पहले से भी ज्यादा मामलों में वृद्धि हुई। हाथरस, बलरामपुर व राजस्थान की घटनाएँ ताजा उदाहरण हैं जहां बलात्कारियों ने सारी की सारी मानवता को तार-तार कर दिया।
निश्चित रूप से हमारे यहां रेप के मामले डरावने हैं, 2018 में दुष्कर्म के 33,356 मामले दर्ज हुए, जिनमें आधे से ज्यादा पीड़िता नाबालिक बच्चियां थीं। भारत में औसतन रोजाना 90 से 100 दुष्कर्म की घटनाएँ घटती हैं। ये आंकड़े वह हैं जो रिपोर्ट किए जाते हैं, बाकी गांव-देहातों में लाज जज्जा के कारण रेप के मामले दर्ज ही नहीं हो पाते। वहां आज भी पंचायतों द्वारा सुलझाए जाते हैं। पीड़िताओं को धन रूपी थोड़ा बहुत मुआवजा देकर मामला रफा-दफा कर दिया जाता है। 2017 में दुष्कर्म के 32,559 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2016 के लिए यह आंकड़ा 38,947 था। इसके बाद 2019 में रिकॉर्डतोड़ मामले सामने आए।
रेप के मामले बढ़ रहे हैं। बलात्कार के कानून में बदलाव भी किए गए, सख्त नियमों के बाद भी अपराधी अपराध करने से नहीं डरते। जैसे पाकिस्तान में अब बलात्कारियों को रासायनिक तरीके से नपुंसक बनाया जाएगा, ठीक उसी तरह से हमारे भी नियम लागू किए जाएं। कानून बनाने को लेकर पाकिस्तान में पक्ष-विपक्ष सभी ने एक सुर में अपनी सहमति दी। क्योंकि बलात्कार एक ऐसा अपराध है जिसका कोई पक्ष नहीं ले सकता। घिन्न आता है बलात्कारियों का नाम सुनकर भी। अपराधी किसी भी धर्म-समुदाय से ताल्लुक रखता हो, चाहें कितनी भी बड़ी पहुंच वाला क्यों न हो, उसकी सिर्फ एक ही सजा होनी चाहिए, नपुंसक या फांसी? जैसा पाकिस्तान किया जा रहा है। हालांकि नपुंसक बनाने का कानून और भी कई इस्लामिक देशों में पहले से लागू है। इस डरावने कानून से वहां ये अपराध नियंत्रण में है।
बहरहाल, दुष्कर्म अपराध को नए सिरे से परिभाषित करना समय की मांग है। ये मांग सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं, बल्कि भारत जैसे देशों में भी महसूस की जा रही है। भारत में शायद ऐसा कानून बन पाए, क्योंकि इसके पीछे एक बड़ी बजह है। बलात्कार के मामलों में 33 प्रतिशत सफेदपोश, अधिकारी व उच्च वर्ग के लोग संलिप्त हैं। कई राजनेता तो इस वक्त जेलों में कैद हैं जिन्होंने बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया है। अब ऐसा तो हो नहीं सकता है कि बलात्कारियों के लिए अलग-अलग कानून बनाए जाएं। आम के लिए अलग और खास के लिए अलग? अगर इस रूप में देखें तो निर्भया के दोषी आम लोग थे, इसलिए उन्हें फांसी पर लटका दिया गया, खुदा-न-खास्ता वह भी सत्ता के गलियारों से वास्ता रखते होते तो उनका भी केस समय के साथ चलता रहता।
ऐसे राजनेताओं-अधिकारियों की संख्या कम नहीं, जो रेप करके कुछ सालों जेल में रहकर जमानत पर बाहर हैं। कुल मिलाकर, पाकिस्तान की तर्ज पर अगर भारत में भी रेपिस्टों को नपुंसक बनाने का कानून बना दिया जाए, तो निश्चित रूप से मामलों में गिरावट आएगी। बलात्कार अपराध के लिए नपुंसक और फांसी दोनों सजा संयुक्त रूप से लागू हों। कानून के मुताबिक नपुंसक बनाने के वक्त बलात्कारियों को एक च्वाइस देनी चाहिए। उनसे पूछा जाए, नपुंसक बनना है या फांसी पर लटकना है? जब एकाध मामलों ऐसे ये नियम लागू हो जाएंगे, तो भय पैदा होना स्वाभाविक होगा। समय की दरकार है, पाकिस्तान के देखा देख, हिंदुस्तान की हुकूमत को भी ऐसी पहल करनी चाहिए। इसमें जन मानस की सहमति सौ प्रतिशत होगी। शायद ही कोई विरोध करे। उत्तर प्रदेश सरकार की योगी सरकार जब लव जिहाद पर शिकंजा कस सकती है, तो केंद्र सरकार को पाकिस्तान की तरह नपुंसक कानून बनाने में भला क्या गुरेज होगी?

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