महिला आरक्षण मामले में अध्यादेश/विधेयक ही होगा बेहतर विकल्पः मोर्चा
-शीर्ष न्यायालय में एसएलपी दाखिल करने में है जोखिम
-30 फ़ीसदी क्षैतिज आरक्षण की थी अब तक व्यवस्था
-उच्च न्यायालय ने लगाई है आरक्षण पर रोक
विकासनगर, । जन संघर्ष मोर्चा अध्यक्ष एवं जीएमवीएन के पूर्व उपाध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा कि राज्य की महिलाओं हेतु प्रावधानित 30 फ़ीसदी क्षैतिज आरक्षण पर उच्च न्यायालय ने 24 अगस्त को रोक लगाई है, जिसको लेकर सरकार पसोपेश में है कि अध्यादेश लाया जाए या शीर्ष न्यायालय में एसएलपी दाखिल की जाए।
उक्त मामले में मोर्चा सरकार से अपील करता है कि शीर्ष न्यायालय में एसएलपी दाखिल करने के बाद भी सफलता की गुंजाइश कम ही है क्योंकि सिर्फ जी.ओ. के आधार पर न्यायालय में टिक पाना दुष्कर कार्य है द्यअगर एक्ट बना होता तो लड़ाई मजबूती से लड़ी जा सकती थी, इसलिए अध्यादेश लाकर या विशेष सत्र बुलाकर विधेयक लाया जा सकता है, जिससे राज्य की महिलाओं को त्वरित गति से उनको उनका हक मिल सकता है द्य हाल ही में मा. उच्च न्यायालय ने लोक सेवा आयोग की ओर से पीसीएस परीक्षा में कट ऑफ लिस्ट आरक्षित वर्ग के उत्तराखंड मूल की महिलाओं के आरक्षण पर भी रोक लगाई है, जिस पर सुनवाई 11 अक्टूबर को होनी है। नेगी ने कहा कि प्रदेश की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के दृष्टिगत एवं महिलाओं के उत्थान हेतु ही विशेष तौर पर जुलाई 2001 में 20 फ़ीसदी एवं जुलाई 2006 में इसको बढ़ाकर 30 फ़ीसदी कर क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। पत्रकार वार्ता में विजय राम शर्मा व अमित जैन मौजूद रहे।